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Sunday, June 28, 2020

मन को सुधारिए वह सुधरेगा !!

पवित्र विचारों से "मन" पर वांछित संस्कार पड़ते हैं,उसका परिमार्जन होता है और उसमें उर्ध्वगामी होने की रुचि पुनः उत्पन्न होती है ।

"मन" मनुष्य के मनोरथों को पूरा करने वाला सेवक होता है । मनुष्य जिस प्रकार की इच्छा करता है, "मन" तुरंत उसके अनुकूल संचालित हो उठता है और उसी प्रकार की परिस्थितियाँ सृजन करने लगता है ।



"मन" आपका सबसे "विश्वस्त मित्र"और "हितकारी बंधु" होता है ।

यह सही है कि बुरे विचारों का त्याग "श्रमसाध्य" अवश्य है, किंतु "असाध्य" कदापि नहीं । "विकृतियों" के अनुपात में ही "सत्प्रयासों" की आवश्यकता है । बीसों साल की पाली हुई विकृतियों को कोई एक दो महीनों में ही दूर कर लेना चाहता है, तो वह गलती करता है विकृतियाँ जितनी पुरानी होगी, उतने ही शीघ्र एवं दृढ़ अभ्यास की आवश्यकता होगी ।

"अभ्यास" में लगे रहिए, एक-दो साल ही नहीं, जीवन के अंतिम क्षण तक लगे रहिए । मानसिक विकृतियों से हार मानकर बैठे रहने वाला व्यक्ति जीवन में किसी प्रकार की सफलता प्राप्त नहीं कर सकता ।

"मन" को परिमार्जित करने, उसे अपने अनुकूल बनाने में केवल "विचारशक्ति" ही नहीं, अपनी "कर्मशक्ति" भी लगाइए ।जिस कल्याणकारी विचार को बनाएँ, उसे क्रिया रूप में भी परिणत कीजिए ।
By: via PLANET KRISHNA

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